एक नया ख्वाब
चलो आज नया एक ख्वाब बुनते है
सफेद कागज मे फिर नया रंग भरते हैं
चलो आज नया एक ख्बाव फिर बुनते है ।।बारिश की बुंदो मे गल जायेगी,
रंग-बिरंगी कागज की यह दूनिया
फिकी ना हो रंगो की चटक,
आओ एक नया घर ढुढ़ते है
चलो आज नया एक ख्बाव बुनते है ।।
टूटे हुए ख्बाव के महल को,
निर्मान को सोचते है
भंवर जाल मे फसे इस जीवन को,
नयी दिशा देते है.
चलो आज नया ख्बाव बुनते है ।।
दुख-सुख आना जाना है
इनसे नही घबराना है.
आज है काली रात,
तो कल होगी सुनहरी सूबह
यही उम्मीद जागते है,
चलो ,चलो नया एक ख्बाव फिर से बुनते है ।।
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